Ram Kasture

यही तथ्य समाज को परिवार से दूर करता है. ----------------------------------

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कहते है जब बच्चा पेट में होता है, वह अपने पैर माँ के पेट को मारता है, माँ को उसमे आनंद आता है. माँ लात और मजा लेने की अभ्यस्थ हो चूकी है. इसीलिए बेटा या बेटी जब कुछ बुरा कहे उसका माँ बुरा नहीं मानती. यहाँ तक कि जब बच्चे उसे और बाप को रहने को अलग रहने को मजबूर करते है. तब माँ ही अपने पति को समझाती है. अपना ही बेटा है जैसा उसको करना हो कर लेने दो. बाप अपनी पत्नी को अपनी जवाबदारी समझ कर उसकी बात मानता है. बाप यह जानता है कि उसकी अंतिम जवाबदारी उसे निभाना है. क्या यह सच नहीं है कि जो लात खाने का आदी न हो वह कैसे लात सहन करेगा. बाप जीवन भर अपनी धर्म आधारित जीवन का दायित्व बिना किसी लोभ लालच के निभाता है वह अब अपने अंतिम पड़ाव में क्या बच्चो की खरीखोटी सुनेगा? किन्तु लोग लात खाते है और अपनी पत्नी के कारण यह वह सहन करता है ? "जाविधी राखो राम ता विधी रहिये" के सिधांत पर अपना जीवन व्यतीत करता है. मैंने ऐसे अनेक उदाहरन देखे है जो अपनी अंतिम जवाबदारी निभाने के बाद अपनी शर्त पर जीवन जीते है. समाज उन्हें संतुलन बनाकर चलने वाला नहीं कहता, अंतिम समय में उसे समाज से क्या लेना देना ? वह तो अपना देहदान पहले ही कर चूका है. अब समाज को जो करना है करे? समाज भी उसी पेड़ की तरफ भागता है जिसमे फल लगे हो. यही तथ्य समाज को परिवार से दूर करता है.

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